पीएम मोदी का दावा, 2014 से एनआरसी पर सरकार द्वारा कोई चर्चा नहीं की गई

नई दिल्ली में पीएम की टिप्पणी के विपरीत, अमित शाह, उनकी पार्टी के घोषणापत्र, असम के सीएम और उन्होंने खुद इस साल इस मुद्दे पर टिप्पणी की है।

रविवार को, प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने दिल्ली के रामलीला मैदान में एक रैली में बोलते हुए, नागरिकता संशोधन अधिनियम को लागू करने के लिए अपनी सरकार के फैसले का बचाव किया। सीएए को नागरिकता के राष्ट्रीय रिकॉर्ड (एनआरसी) से अलग करने की कोशिश करते हुए मोदी ने दावा किया कि 2014 में उनकी सरकार के सत्ता में आने के बाद उनकी सरकार ने एनआरसी का कभी उल्लेख नहीं किया। एनआरसी का कोई भी कार्यान्वयन सुप्रीम कोर्ट के निर्देश के बाद केवल असम तक सीमित था।

बूम ने मोदी द्वारा दिए गए भाषणों और गृह मंत्री अमित शाह द्वारा दिए गए बयानों को देखा और पाया कि यह दावा गलत है।

मोदी ने ना केवल इस वर्ष लोकसभा चुनाव से पहले प्रचार अभियान के दौरान एनआरसी का उल्लेख किया है, बल्कि केंद्रीय गृह राज्य मंत्री अमित शाह ने भी कई बार विभिन्न अवसरों पर, विशेष रूप से नागरिकता संशोधन विधेयक (अब एक अधिनियम) के साथ इसका उल्लेख किया है।

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रविवार को 2 घंटे से अधिक लंबे भाषण में मोदी ने कहा

" मेरी सरकार आने के बाद, 2014 से आज तक, मैं सारी 130 करोड़ देशवासियों को कहना चाहता हूं कि कहीं पर भी एनआरसी शब्द की कोई चर्चा नहीं हुई, कोई बात नहीं हुई, सिर्फ सुप्रीम कोर्ट ने जब कहा, तो वो सिर्फ असम के लिए करना पड़ा, क्या बातें कर रहे हो..."

उनके बयान को यहां देखा जा सकता है।

मोदी इस मेगा रैली में एनआरसी प्रक्रिया से सरकार को दूर करने का प्रयास कर रहे थे। 12 नवंबर को विवादास्पद सीएए के एक अधिनियम बनने से यह एख बड़ा मुद्दा बन गया है। अधिनियम के खिलाफ देशव्यापी आंदोलन में 20 से अधिक लोग मारे गए हैं।

प्रधानमंत्री मोदी ने कब-कब एनआरसी के बारे में कहा

इससे पहले दो मौकों पर प्रधानमंत्री मोदी ने कहा था कि एनआरसी लागू किया जाएगा।

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सबसे पहले, उन्होंने 4 जनवरी को असम के सिलचर में एक रैली में यह बयान दिया, जहां उन्होंने एनआरसी के आने की बात को दोहराया।

"यह भरोसा दिलाने आया हूं कि राष्ट्रीय नागरिकता की रजिस्ट्री (sic) - एनआरसी...आपको फिर से भरोसा देता हूं कि कोई भी भारतीय नागरिक उसमें से नहीं छुटेगा, ये मैं आपको विश्वास दिलाता हूं। "

बाद में वह उस दर्द पर चर्चा करते हैं जिसका प्रक्रिया के दौरान नागरिकों ने सामना किया है, लेकिन इस मुद्दे से होने वाले भले के लिए लोगों के बलिदान को श्रेय देते हैं।

उनके बयान को यहां देखा जा सकता है।

इस साल 19 अप्रैल को, टाइम्स नाउ के साथ एक साक्षात्कार में, मोदी ने पिछली सरकारों द्वारा असम समझौते के प्रावधानों को लागू नहीं करने की भी आलोचना की थी।

"एनआरसी के बाद पता चला कि ये चित्र बड़ा चिंताजनक है और चिंताजनक है तो देश में इसकी चर्चा होनी चाहिए। और दुनिया में कोई देश ऐसा होगा जो धर्मशाला हो? कोई देश ऐसा होगा जिसके पास देश के सीटिजन का रजिस्टर ना हो?"

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इस बयान को नीचे देखा जा सकता है।

18 सितंबर, 2018 को, सोराबानंद सोनोवाल ने नई दिल्ली में एनआरसी पर एक सेमिनार में भाग लिया, जहां उन्होंने देश के बाकी हिस्सों के लिए एनआरसी के असम मॉडल का उल्लेख किया।

प्रेस रीलीज में कहा गया है:

"यह कहते हुए कि घुसपैठ को अनियंत्रित नहीं होने दिया जा सकता है जो अन्यथा सामाजिक सद्भाव और देश की क्षेत्रीय अखंडता पर विनाशकारी परिणाम हो सकता है, मुख्यमंत्री ने दोहराया कि असम में अवैध प्रवासन की समस्या से निपटने के लिए एनआरसी प्रक्रिया देश भर में एक मॉडल हो सकती है। उन्होंने यह भी कहा कि ड्राफ्ट एनआरसी एक कानूनी प्रक्रिया के माध्यम से सामने आया है, और राज्य और केंद्र सरकारें एक दोषरहित एनआरसी को बाहर लाने के लिए सुप्रीम कोर्ट के निर्देशों के तहत अपने संवैधानिक कर्तव्यों का पालन कर रही हैं। "

प्रेस रीलीज यहां देखी जा सकती है।

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भाजपा का घोषणापत्र

भाजपा ने इस साल के अपने चुनावी घोषणापत्र में कहा कि भाजपा सरकार एनआरसी को अवैध घुसपैठ से निपटने के लिए एक उपकरण के रूप में लागू करेगी। भारत के कुछ हिस्सों में जनसंख्या पर एक प्रतिकूल सांस्कृतिक भाषाई प्रभाव का हवाला भी दिया गया था।

भाजपा के घोषणापत्र का एक स्नैपशॉट यहां देखा जा सकता है।


अमित शाह ने क्या कहा

इससे पहले, बूम ने पांच उदाहरणों पर प्रकाश डाला जहां गृह मंत्री अमित शाह ने इसे काफी स्पष्ट किया, एनआरसी संसद में नागरिकता संशोधन विधेयक के पारित होने का पालन करेगा।

इसे यहाँ पढ़ा जा सकता है।

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इनमें से, शाह ने 23 अप्रैल को एक संवाददाता सम्मेलन के दौरान कहा: "कालक्रम को समझें। पहले सीएबी आएगा, और सीएबी के बाद एनआरसी आएगा, न केवल बंगाल के लिए, बल्कि पूरे देश के लिए।" इसी तरह का एक बयान एबीपी न्यूज़ को भी दिया गया था, जहां वह उसी प्रक्रिया को दोहराते हैं।

एनआरसी एक ऐसी प्रक्रिया है, जो उन भारतीयों की एक सूची तैयार करती है, जो 24 मार्च 1971 से पहले की कानूनी नागरिकता के लिए अपने या अपने पूर्वजों की मौजूदगी को साबित कर सकते हैं। ऐसा करने में विफल होने पर किसी को विदेशी घोषित कर दिया जा सकता था। 19 लाख लोग असम में एनआरसी से बाहर थे, जिनमें से कई हिंदू थे।

नागरिकता संशोधन अधिनियम, 2019 संसद द्वारा पारित किया गया था और राष्ट्रपति राम नाथ कोविंद द्वारा अनुमोदित किया गया था। यह अधिनियम जो धार्मिक उत्पीड़न से भागकर शरणार्थी के रूप में भारत आने वाले छह गैर-मुस्लिम धार्मिक अल्पसंख्यकों को भारतीय नागरिकता तक पहुंच में अनुमति देता है। जबकि अधिनियम के विरोधियों का कहना है कि यह भेदभावपूर्ण है, सरकार का कहना है कि यह असहाय शरणार्थियों के लिए छोटी मानवता मदद होगी जिनके पास जाने के लिए कोई और जगह नहीं है।

इनमें से, शाह ने 23 अप्रैल को एक संवाददाता सम्मेलन के दौरान कहा: "कालक्रम को समझें। पहले सीएबी आएगा, और सीएबी के बाद एनआरसी आएगा, न केवल बंगाल के लिए, बल्कि पूरे देश के लिए।" इसी तरह का एक बयान एबीपी न्यूज़ को भी दिया गया था, जहां वह उसी प्रक्रिया को दोहराते हैं।

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एनआरसी एक ऐसी प्रक्रिया है, जो उन भारतीयों की एक सूची तैयार करती है, जो 24 मार्च 1971 से पहले की कानूनी नागरिकता के लिए अपने या अपने पूर्वजों की मौजूदगी को साबित कर सकते हैं। ऐसा करने में विफल होने पर किसी को विदेशी घोषित कर दिया जा सकता था। 19 लाख लोग असम में एनआरसी से बाहर थे, जिनमें से कई हिंदू थे।

यह अधिनियम जो धार्मिक उत्पीड़न से भागकर शरणार्थी के रूप में भारत आने वाले छह गैर-मुस्लिम धार्मिक अल्पसंख्यकों को भारतीय नागरिकता तक पहुंच में अनुमति देता है। जबकि अधिनियम के विरोधियों का कहना है कि यह भेदभावपूर्ण है, सरकार का कहना है कि यह असहाय शरणार्थियों के लिए छोटी मानवता मदद होगी जिनके पास जाने के लिए कोई और जगह नहीं है।

Claim :   सरकार ने 2014 के बाद से एनआरसी पर कभी चर्चा नहीं की
Claimed By :  Narendra Modi
Fact Check :  False
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