फैक्ट चेक: ईरान से पलायन करते लोगों के दावे से नेपाल का वीडियो वायरल
बूम से बातचीत में वीडियो बनाने वाले प्रदीप शाही ने बताया कि यह वीडियो उन्होंने नेपाल स्थित डोलपा जिले के रूप पाटन क्षेत्र में रिकॉर्ड किया था.

ईरान में हुए राष्ट्रव्यापी विरोध प्रदर्शनों के बीच सोशल मीडिया पर एक वीडियो तेजी से वायरल हो रहा है. वीडियो में पहाड़ी रास्तों पर बड़ी संख्या में लोगों को भागते-दौड़ते देखा जा सकता है. इसके साथ दावा किया जा रहा है कि हजारों लोग सुरक्षित स्थान की तलाश में ईरान की राजधानी तेहरान छोड़कर पहाड़ों के रास्ते पलायन कर रहे हैं.
बूम ने पाया कि वीडियो के साथ किया जा रहा दावा गलत है. वायरल वीडियो ईरान की राजधानी तेहरान का नहीं बल्कि नेपाल का है. बूम से बातचीत में वीडियो बनाने वाले प्रदीप शाही ने भी इसकी पुष्टि की और बताया कि यह वीडियो उन्होंने नेपाल स्थित डोलपा जिले के रूप पाटन क्षेत्र में रिकॉर्ड किया था.
आर्थिक संकट के चलते ईरान में इस्लामिक सरकार के खिलाफ दिसंबर 2025 से राष्ट्रीय स्तर पर शुरू हुए हिंसक विरोध प्रदर्शन अब धीरे-धीरे कमजोर पड़ते दिखाई दे रहे हैं. ईरानी सरकार ने देशभर में इंटरनेट सेवाएं बंद करने के साथ-साथ कड़ी सेंसरशिप भी लागू कर दी है. एक आंकड़े के अनुसार 28 दिसंबर 2025 से शुरू इन प्रदर्शनों में अब तक कम से कम 5000 लोगों मौत हो चुकी है.
सोशल मीडिया पर क्या है वायरल?
एक्स पर वायरल हो रहे करीब 20 सेकंड के इस वीडियो में भारी संख्या में भीड़ पहाड़ी रास्ते से जाती हुई दिखाई दे रही है. यूजर इस वीडियो को ईरान का बताते हुए लिख रहे हैं कि 'ईरान से चौंकाने वाला दृश्य: हजारों तेहरान निवासी पहाड़ों के रास्ते राजधानी तेहरान से भाग निकले. खूनी क्रांति और अब अमेरिका के दखल की आशंका के बीच लोग अपनी जान बचाने के लिए सुरक्षित स्थान ढूंढ़ रहे हैं.' (आर्काइव लिंक) वायरल वीडियो में मौजूद टेक्स्ट में भी अरबी भाषा में इसी तरह का दावा किया गया है.
पड़ताल में क्या मिला:
वीडियो के बैकग्राउंड में लोग नेपाली भाषा में बातचीत कर रहे हैं, जिससे हमें अंदेशा हुआ कि वीडियो के साथ गलत दावा किया जा रहा है.
वायरल वीडियो पुराना है
वीडियो के कीफ्रेम को रिवर्स इमेज सर्च करने पर हमें Routine of Nepal banda नाम के इंस्टाग्राम और एक्स अकाउंट पर 1 जून 2025 का अपलोड किया गया यही वीडियो मिला, जो बताता है कि वीडियो पुराना है और इसका ईरान में जारी हालिया उठा-पटक से कोई संबंध नहीं है.
इसके नेपाली और अंग्रेजी कैप्शन में बताया गया कि यह वीडियो नेपाल के डोलपा जिले का है, जहां रूप पाटन में यार्सागुम्बा की तलाश में बड़ी संख्या में लोग एकत्रित हुए थे.
यार्सागुम्बा फंगस एकत्रित करने जाते हैं लोग
Madeinnepal नाम के एक इंस्टाग्राम अकाउंट ने 2 जून 2025 को इस वीडियो को शेयर करते हुए बताया था कि हर साल रूप पाटन समेत डोलपा के कई ऊंचाई वाले इलाकों में यार्सागुम्बा इकट्ठा के लिए लोगों की भारी भीड़ उमड़ती है. यार्सागुम्बा एक दुर्लभ और बेशकीमती औषधीय फंगस है.
इसके मुताबिक, 'हिमालयन गोल्ड' के नाम से मशहूर यार्सागुम्बा 3000 से 5000 मीटर की ऊंचाई पर उगता है. डोलपा और आसपास के जिलों- रुकुम, जाजरकोट और जुमला के लोग इन ऊंचे पहाड़ी घास के मैदानों तक की कठिन यात्रा करते हैं और कुछ समय के लिए वहां कैंप लगाते हैं. यार्सागुम्बा इकट्ठा करने से होने वाली आय से ही कई परिवारों का पूरे साल का गुजारा होता है.
नेपाल के प्रदीप शाही ने बनाया था वीडियो
इन सभी पोस्ट में वीडियो का क्रेडिट Nedo Soch नाम के टिकटॉक अकाउंट को दिया गया था. सर्च करने पर हमें Nedo Soch/Nedo Yatri के टिकटॉक और इंस्टाग्राम अकाउंट पर यह वीडियो मिला, जहां यह वीडियो 29-30 मई 2025 को अपलोड किया गया था. इसके साथ दी गई जानकारी में भी इसे नेपाल के डोलपा का बताते हुए लिखा गया था कि यह यार्सागुम्बा फंगस इकट्ठा करने के दौरान का वीडियो है.
Nedo Yatri Soch के फेसबुक और यूट्यूब चैनल पर भी इसके कई वीडियो मौजूद हैं. इससे जुड़े वीडियो और व्लॉग के मुताबिक डोलपा के रूप पाटन में यार्सागुम्बा कलेक्ट के लिए इस तरह की भीड़ जमा होती है. संबंधित वीडियो यहां, यहां और यहां देख सकते हैं.
Nedo Yatri Soch के इंस्टाग्राम पर उपलब्ध जानकारी के मुताबिक इस पेज को चलाने वाले का नाम Pradip shahi Thakuri है, जो कि नेपाल के डोलपा जिले के रहने वाले हैं. पुष्टि के लिए हमने प्रदीप से भी संपर्क किया. उन्होंने बूम को बताया कि वीडियो उन्होंने खुद शूट किया था. यह वीडियो उनके गांव के पास रूप पाटन, डोलपा में 2082-02-13 (नेपाली कैलेंडर) यानी 27 मई 2025 को रिकॉर्ड किया गया था, जब लोग यार्सागुम्बा हार्वेस्टिंग के लिए जा रहे थे.
काठमांडू पोस्ट के मुताबिक करनाली प्रांत के दूरस्थ पहाड़ी जिले डोलपा में यार्सागुम्बा इकट्ठा करने का मौसम शुरू होते ही कक्षाएं शांत हो जाती हैं. छात्र-अभिभावक और यहां तक कि शिक्षक भी इस कीमती जड़ी को एकत्रित करने के लिए ऊंचे पहाड़ी घास के मैदानों की ओर निकल पड़ते हैं.



