प्रदूषण से उम्र कम नहीं होती: जावड़ेकर; अध्यन कहते हैं यह दावा ग़लत है

प्रकाश जावड़ेकर का कहना है कि वायु प्रदूषण एक वैश्विक समस्या है इसलिए डर फैलाने की कोई जरुरत नहीं है।

पर्यावरण, वन और जलवायु परिवर्तन मंत्री, प्रकाश जावड़ेकर ने मंगलवार, 6 दिसंबर को संसद में कहा कि कोई भी भारतीय अध्ययन वायु प्रदूषण और मनुष्य के आयु के बीच सह-संबंध नहीं दिखाता है। उनके इस बयान की पर्यावरणविदों और जलवायु परिवर्तन कार्यकर्ताओं ने काफी आलोचना की है।

प्रकाश जावड़ेकर डॉ. काकोली घोष के एक सवाल का जवाब दे रहे थे। पश्चिम बंगाल के बारासात के सांसद, डॉ. घोष ने पूछा कि क्या सरकार ने बिगड़ती वायु गुणवत्ता पर ध्यान दिया है और उन्होंने 2016 के एक अध्ययन का उल्लेख किया जिसमें कहा गया है कि अगर भारत वायु प्रदूषण के लिए डब्ल्यूएचओ के दिशानिर्देशों को पूरा करता है, तो भारतीयों की जीवन प्रत्याशा 4.3 वर्ष बढ़ जाएगी।

पिछले दो महीनों से दिल्ली में खराब वायु गुणवत्ता का सामना करना पड़ रहा है, जिसके कारण वायु प्रदूषण को सार्वजनिक स्वास्थ्य आपातकाल घोषित कर दिया गया। दिल्ली में सांस लेना एक दिन में सिगरेट के लगभग 4 पैकेट धूम्रपान करने के समान था।

हालांकि, मंत्री ने कहा कि आलोचक एक डर मनोविकृति पैदा कर रहे हैं और किसी भी भारतीय अध्ययन ने वायु प्रदूषण और जीवन काल के बीच सह-संबंध नहीं दिखाया है। उन्होंने आगे कहा कि सभी वैश्विक अध्ययन माध्यमिक अध्ययनों पर आधारित हैं और पहली पीढ़ी, वास्तविक समय के आंकड़ों पर ध्यान नहीं देते हैं।


क्या कहता है भारतीय अध्ययन

आईसीएमआर अध्ययन

इंडियन काउंसिल ऑफ मेडिकल रिसर्च (आईसीएमआर) ने एक अध्ययन प्रकाशित किया था जिसमें कहा गया था कि भारत में आठ में से एक मौत का कारण वायु प्रदूषण हो सकता है। अध्ययन में यह भी पाया गया कि वायु प्रदूषण को ठीक से नियंत्रित करने पर भारतीयों की जीवन प्रत्याशा 1.7 साल तक बढ़ सकती है। आईसीएमआर केंद्र सरकार के तहत प्रमुख मेडिकल रिसर्च इकाई है।

रिपोर्ट में वायु प्रदूषण के जोखिम का अनुमान लगाया गया है, जिसमें पीएम 2.5 का परिवेशीय पार्टिकुलेट मैटर प्रदूषण और घरेलू वायु प्रदूषण शामिल है जिसे ग्लोबल बर्डन ऑफ डिजीज, इंजरीज़, और रिस्क फैक्टर्स स्टडी (जीबीडी) 2017 के हिस्से के रूप में कई स्रोतों से उपलब्ध डेटा का उपयोग करते हुए ठोस खाना पकाने के ईंधन और पीएम 2.5 के लिए इसी जोखिम का उपयोग कर घरों के प्रतिशत के रूप में परिभाषित किया गया है।

इस रिपोर्ट ने भविष्यवाणी की कि गर वायु प्रदूषण का स्तर डब्लूएचओ द्वारा व्यक्त की गई अनुमेय सीमा के समान होने पर भारत के प्रत्येक राज्य में जीवन प्रत्याशा क्या होगी। जीबीडी ने 1990 से 2016 तक रोगों की प्रवृत्ति, उनकी मृत्यु दर और प्रभाव का विश्लेषण किया। प्रमुख खोज यह थी कि कुपोषण के बाद भारत में बीमारी के बोझ में योगदान देने वाला दूसरा सबसे बड़ा जोखिम कारक वायु प्रदूषण था।

अध्ययन ने विकलांगता समायोजित जीवन वर्ष (DALYs) के माध्यम से वायु प्रदूषण, घरेलू वायु प्रदूषण और ठोस खाना पकाने के ईंधन के उपयोग के प्रभाव का अनुमान लगाया गया था और पाया कि 2017 में वैश्विक आबादी का 18% भारत में था, लेकिन वायु प्रदूषण के कारण वैश्विक DALYs का 26% भारत में था।

DALY एक व्यक्ति पर समग्र रोग भार के साथ आबादी को मापता है और अस्वस्थता, विकलांगता या प्रारंभिक मृत्यु के कारण खो जाने वाले वर्षों की संख्या के रूप में व्यक्त किया जाता था। यह जीवन प्रत्याशा का आकलन करने में सहायता करता है। वायु प्रदूषण के लिए DALYs में कम श्वसन संक्रमण, क्रॉनिक ऑब्सट्रक्टिव पल्मोनरी डिजीज, और इस्केमिक हार्ट की बीमारी के साथ-साथ स्ट्रोक, डायबिटीज, लंग कैंसर और मोतियाबिंद के कारण खोने वाले वर्ष शामिल हैं। वायु प्रदूषण के संपर्क के वर्तमान स्तर की डब्लूएचओ द्वारा अनुमेय स्तरों के साथ तुलना की गई और रोगों की प्रवृत्ति में अनुमानित परिवर्तनों के साथ-साथ जीवन प्रत्याशा में वृद्धि का विश्लेषण किया गया।

भारत में कुल बीमारी के बोझ का 8% और 70 साल से कम उम्र के लोगों में 11% लोगों की समय से पहले होने वाली मौतों का कारण वायु प्रदूषण हो सकता है।

2017 में, भारत में, करीब 1.24 मिलियन लोगों की मौत का कारण वायु प्रदूषण हो सकता है। वायु प्रदूषण को नियंत्रित करने से संभवतः जीवन प्रत्याशा में 1.7 साल की वृद्धि होगी।

अन्य अध्ययन

पर्यावरण थिंक टैंक, सेंटर फॉर साइंस एंड एन्वायरमेंट ने यह भी बताया कि पीएम2.5 भारत में जीवन प्रत्याशा में 2.6 साल के नुकसान में योगदान दे रहा है। सीएसई ने जीवन प्रत्याशा का आकलन करने के लिए उपरोक्त तकनीक का उपयोग किया है।

इस रिपोर्ट के अनुसार, भारत में 2019 में, सभी स्वास्थ्य जोखिमों के बीच मृत्यु का तीसरा सबसे बड़ा कारण वायु प्रदूषण था। दूसरा कारण धूम्रपान था।

मंत्री के बयान के संबंध में, बूम ने सीएसई में प्रोग्राम मैनेजर विवेक चट्टोपाध्याय से बात की।

"कई भारतीय अध्ययन हैं,जैसे कि आईसीएमआर द्वारा किया गया अध्ययन। इसके अलावा, डब्ल्यूएचओ के आंकड़ों और अन्य वैश्विक सबूतों को नजरअंदाज नहीं किया जाना चाहिए। वे सभी सांख्यिकीय महत्वपूर्ण अध्ययन हैं जो वायु प्रदूषण को गंभीरता से लेने की आवश्यकता का सुझाव देते हैं।"

संसद में घोष द्वारा उद्धृत कनाडाई अध्ययन में इस बात पर भी प्रकाश डाला गया है कि अध्ययनों में वायु प्रदूषण और जीवन प्रत्याशा के कुल नुकसान के बीच एक संबंध पाया गया है। अध्ययन में यह भी कहा गया है कि वायु प्रदूषण का पार्टिकुलेट मैटर वैश्विक जीवन प्रत्याशा को लगभग 2 साल कम कर देता है।

विश्व स्वास्थ्य संगठन में उप महानिदेशक (कार्यक्रम) और आईसीएमआर के पूर्व महानिदेशक सौम्या स्वामीनाथन ने सरकारों और नागरिकों से वायु प्रदूषण को नियंत्रित रखने का आग्रह किया है।

उनका ट्वीट एक अध्ययन के जवाब में था जिसमें कहा गया था कि वायु प्रदूषण को कम करने के लिए दुनिया भर में किए गए उपायों से अधिकांश देशों में स्वास्थ्य लाभ में सुधार हुआ है। उदाहरण के लिए, जब आयरलैंड ने 2004 में कार्यस्थलों पर धूम्रपान पर प्रतिबंध लगा दिया, तो केवल एक सप्ताह में किसी भी कारण से मरने वाले लोगों की संख्या में 13 प्रतिशत की गिरावट आई है।

विश्व स्वास्थ्य संगठन ने भी ट्वीट किया कि जलवायु परिवर्तन एक स्वास्थ्य मुद्दा है। इसके साथ ही एक वीडियो भी दिया गया जिसमें जलवायु परिवर्तन मनुष्यों को प्रभावित करने वाले विभिन्न तरीकों पर प्रकाश डाला गया है।


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