BSF की नौकरी छोड़ बने टीचर, यूपी में 'हिंदू-मुस्लिम' राजनीति का कैसे हुए शिकार
उत्तर प्रदेश के मथुरा जिले के नौहझील स्थित प्राथमिक विद्यालय में प्रधानाध्यापक जान मोहम्मद का निलंबन वापस ले लिया गया है. उनके खिलाफ लगे आरोप झूठे पाए गए.

स्कूल में बच्चों से राष्ट्रगान की जगह नमाज पढ़वाने के आरोप में पहले निलंबित किए गए मथुरा के प्रधानाध्यापक जान मोहम्मद ने बहाली के बाद सोमवार को दोबारा स्कूल जॉइन कर लिया है. इससे पहले दो सदस्यीय समिति की जांच के दौरान उन पर लगाए गए आरोप झूठे पाए गए जिसके बाद उन्हें उसी प्राथमिक विद्यालय नौहझील में पोस्टिंग दी गई जहां वह 2007 से कार्यरत हैं.
बीते दिनों उत्तर प्रदेश के मथुरा के नौहझील ब्लॉक स्थित प्राइमरी स्कूल के हेडमास्टर जान मोहम्मद के निलंबन को लेकर खूब विवाद हुआ. पूरे गांव के लोग उनके समर्थन में उतर आए और जान के खिलाफ लगाए गए आरोपों को सिरे खारिज करते हुए डीएम के पास पहुंचे.
विवाद गहराता देख बीएसए रतन कीर्ति ने जांच समिति से तीन दिन में रिपोर्ट मांगी और बीते शुक्रवार 6 फरवरी को जान मोहम्मद को सवेतन बहाल करने का आदेश जारी किया.
इस पूरे विवाद पर बूम से बातचीत में जान मोहम्मद कहते हैं कि वह 10 साल तक बीएसएफ में रहे और इस दौरान उन्होंने राष्ट्रगान को ही नमन किया है. ऐसे में उनके खिलाफ लगे आरोप बेबुनियाद और हास्यास्पद हैं.
स्कूल वापसी पर वह सभी का आभार व्यक्त करते हुए कहते हैं कि यह उनकी 17-18 साल की मेहनत है कि लोग उन पर इतना भरोसा करते हैं.
क्या है पूरा विवाद
हेडमास्टर जान मोहम्मद के खिलाफ बाजना के मंडल अध्यक्ष दुर्गेश प्रधान ने शिकायत की थी कि वह बच्चों को इस्लाम धर्म के प्रति प्रेरित करते हैं, उनका ब्रेनवॉश करके नमाज पढ़वाते हैं और हिंदू देवी-देवताओं का अपमान करते हैं. इसके अलावा वह स्कूल में राष्ट्रगान का गायन भी नहीं कराते और स्कूल में तब्लीगी जमात के लोग आते हैं. शिकायत के आधार पर खंड शिक्षा अधिकारी ने अपनी जांच आख्या 30 जनवरी को बीएसए को पेश की जिसके आधार पर 31 जनवरी को उन्हें निलंबित कर दिया गया.
मीडिया से बातचीत में बेसिक शिक्षा अधिकारी रतन कीर्ति ने कहा कि यह अंतरिम निर्णय है और अंतिम फैसला जांच समिति के अधीन रहेगा. उन्होंने यह भी कहा कि आरोपों को गंभीर मानते हुए उन्होंने निलंबित किया है.
नोटिस मिलने के बाद जान मोहम्मद की तबीयत बिगड़ गई और वह छुट्टी लेकर आगरा चले गए.
वहीं बीएसए के इस फैसले के खिलाफ पूरा गांव हेडमास्टर के समर्थन में एकजुट हो गया. अगले ही दिन 24 से अधिक ग्रामीणों ने डीएम सीपी सिंह से मुलाकात की और उनकी तत्काल बहाली की मांग की.
टीचर के समर्थन में आए स्कूल के बच्चे
मामला बढ़ता देख कई मीडिया संस्थान भी हकीकत जानने के लिए गांव पहुंचे और स्कूल के बच्चों से मिले. एक रिपोर्ट में कक्षा पांच में पढ़ने वाली प्रियांशी ने बताया कि सर बहुत अच्छा पढ़ाते हैं और स्कूल में राष्ट्रगान भी होता है. इतना ही नहीं प्रियांशी ने मीडिया वालों के आग्रह पर राष्ट्रगान का कुछ हिस्सा भी सुनाया. वहीं स्कूल में पढ़ने वाले बच्चों के पैरंट्स ने भी कहा कि जो कुछ खबरों में चल रहा है वह गलत है और वह रोज अपने बच्चों को स्कूल छोड़ने आते हैं और यहां राष्ट्रगान भी होता है.
इसके अलावा यह तथ्य भी सामने आया स्कूल में हेडमास्टर जान मोहम्मद को छोड़कर सभी सात टीचर हिंदू हैं. स्कूल में प्रिंसिपल के अलावा पांच असिस्टेंट टीचर और दो शिक्षामित्र हिंदू हैं. इसके अलावा स्कूल में 235 बच्चे पढ़ते हैं जिनमे 89 मुस्लिम हैं जबकि बाकी हिंदू हैं.
ग्रामीणों ने बताई विवाद की जड़
गांव में रहने वाले कुछ लोगों ने विवाद के पीछे के वजहों का अनुमान जताया. दैनिक भास्कर की रिपोर्ट में एक शख्स ने बताया कि स्कूल में बाउंड्री नहीं है और हेडमास्टर इसे बनवाने का प्रयास कर रहे थे, वहीं बगल वाली जमीन पर कुछ विवाद है और वो लोग बाउंड्री नहीं बनवाने दे रहे थे. बूम से बातचीत में एक स्थानीय रिपोर्टर ने भी कहा कि स्कूल के बगल वाली जमीन के कुछ हिस्से पर विवाद चल रहा है और इसी के चलते कुछ लोगों ने हेडमास्टर के खिलाफ शिकायत कर दी और उनके खिलाफ मनगढ़ंत आरोप लगाए गए.
वहीं दैनिक जागरण की एक रिपोर्ट में बताया गया कि मतदाता सूची की एसआईआर प्रक्रिया में वोट न काटने को लेकर विवाद है. दरअसल निलंबित हेडमास्टर एसआईआर प्रक्रिया के दौरान बीएलओ नियुक्त किए गए थे और ग्रामीणों का कहना है कि उन पर मुस्लिम मतदाताओं के वोट काटने का दबाव बनाया जा रहा था.
हेडमास्टर के खिलाफ कार्रवाई से लोगों का बढ़ता गुस्सा देख बीएसए रतन कीर्ति ने 4 फरवरी को मामले की जांच के लिए समिति को तीन दिन में रिपोर्ट सौंपने का आदेश दिया. जबकि पहले एक महीने का वक्त दिया गया था. विभागीय जांच समिति ने 6 फरवरी को रिपोर्ट सौंपी जिसमें जान मोहम्मद के खिलाफ सभी तरह की शिकायतों को झूठा और निराधार पाया गया. इसके बाद मथुरा बीएसए ने प्रधानाध्यापक की सवेतन बहाली का आदेश दिया.
बूम से बातचीत में बीएसए रतन कीर्ति ने कहा, "इस समिति में खंड शिक्षा अधिकारी मांठ और खंड शिक्षा अधिकारी छाता शामिल थे जिन्होंने गांव के लोगों और पैरंट्स से बात की और उनके लिखित बयान भी लिए गए. हमारी जांच में हेडमास्टर निर्दोष पाए गए इसलिए हमने उन्हें उसी स्कूल में बहाली दी जहां वह पोस्टेड थे."
वहीं बीएसए की कार्यशैली पर उठे सवाल पर रतन कीर्ति ने कहा, "जो लोग सवाल उठा रहे हैं उन्हें निलंबन का नियम पढ़ना चाहिए और सुप्रीम कोर्ट का अशोक अग्रवाल वर्सेज यूनियन ऑफ इंडिया पढ़ लेना चाहिए जिसमें साफ लिखा है कि सस्पेंशन किसी प्रकार का दंड नहीं है, वह एक प्रकार की अस्थायी रोक है कि अगर शिकायत मिल रही है तो वो और ज्यादा न बढ़े और जब वह निर्दोष साबित हो जाते हैं तो वह बहाल हो जाते हैं."
सोमवार को दोबारा स्कूल पहुंचे हेडमास्टर
पूरे विवाद के बाद सोमवार 9 फरवरी को जान मोहम्मद दोबारा अपने स्कूल पहुंचे जहां बच्चों के साथ अध्यापकों ने उनका स्वागत किया. बूम से बातचीत में जान मोहम्मद (56) ने कहा, "यह मेरी 17-18 साल की कमाई है कि लोगों ने मुझपर भरोसा जताया. ऊपर वाला जो भी करता है अच्छा करता है. कहीं एक भी शख्स भी नहीं था पूरे एरिया में जिसने मेरे खिलाफ में बोला हो."
जान मोहम्मद अगस्त 2007 से प्राथमिक विद्यालय नौहझील में पोस्टेड हैं. उन्होंने बताया कि उनकी तैनाती पहले इंचार्ज के रूप में हुई थी और फिर 2013 से वह हेडमास्टर पद पर हैं.
अध्यापन में आने से पहले जान मोहम्मद 1995 से 2005 तक सीमा सुरक्षा बल (बीएसएफ) में तैनात रहे थे. स्कूल में राष्ट्रगान का गायन न कराने के आरोप में वह कहते हैं, "10 साल तक यही गाया है और इसी को नमन किया है. लोग कैसे आरोप लगा सकते हैं."
जान मोहम्मद ने बताया कि उन दिनों वह त्रिपुरा से लेकर, सोनपुर, बारामूला, कुपवाड़ा वगैरह में तैनात रहे और सबसे ज्यादा समय जम्मू-कश्मीर में साढ़े चार तक बिताया. 2004 में बीटीसी का एग्जाम देकर वह टीचिंग लाइन से जुड़ गए.
उन्होंने बताया कि उन्हें रात को वॉट्सऐप पर सस्पेंशन का लेटर मिला था जिस पर लिखे आरोप पढ़कर उन्हें बैचेनी हुई और तबीयत खराब हो गई, जिसके बाद उन्हें आगरा ले जाया गया जहां उनके भाई और परिवार के लोग रहते हैं.
अपने खिलाफ झूठी शिकायत करने वालों पर एक्शन लेने के सवाल पर वह कहते हैं, "मुझे किसी के खिलाफ कोई शिकायत नहीं करनी है. फिर उनमें और मुझमें अंतर ही क्या है, टीचर का तो दायित्व ही यही है कि सभी को सही दिशा देना है सभी को."


